Friday, 6 January 2017

मौन का विराम...

बहुत दिनों बाद गौर से देखा तुमको,
माथे पर सफेद हो आये बालों की लटें
और आँखों पर चढ़ा चश्मा,
चश्मे के पीछे से तुम्हारी बोलती आँखे,
कितनी गंभीरता आ गई तुममें,

कभी वो दिन भी सोचती हूँ,
जब झगड़ा किया करते थे बच्चों की तरह,
हम दोनों ही नाराज़ हो जाते थे एक दूसरे से,
और फिर कितनी रातें यूं ही बीत जाती थीं,
भीगे तकिये के साथ,

पसर जाता था मौन एक लंबे अंतराल तक,
पर इस बार का मौन कुछ ऐसा गुज़रा
जैसे सदियां बीत गई तुमसे बात किए,
तुम्हारे सफेद हो आये बाल जैसे कह रहे हों,
बहुत देर कर दी मौन को विराम देने में।
#ज्योत्सना

पतझड़...

पतझड़ के सूखे पेड़ की तरह लगते हो तुम,
जो बिल्कुल स्थिर खड़ा हो उपवन में,
पल्लव विहिन सूखी टहनियां, जो सहती हैं शीत को,
उम्मीद है एक दिन
तुम पर भी नई कोंपले फूटेंगी
और संचार होगा नवजीवन का,
तब तुम भी नवीन पल्लवों के संग,
झूमोगे और लहलहा उठोगे,
न जाने कब ये पतझड़ खत्म होगा
और बसंत आयेगा तुम्हारे जीवन में....!!!
#ज्योत्सना

Sunday, 13 November 2016

कुछ रंग भरने हैं, इस सूने कैनवस पर...

आज सोचा कि
तुम्हें कुछ भेजूं,
एक संदेश नया
जो मिटा दे
हर कड़वाहट को,
घोल दे मिठास
उन फीके हो चले
रिश्तों पर,
जो कुछ रंग भर दे
सूने कैनवस पर,
पहल तो करनी होगी
मुझे ही,
क्योंकि मैंने खोया जो है तुमको...!!!
#ज्योत्सना

Friday, 18 March 2016

तुम्हारी यादों में...

न हम बदलेंगे, न तुम बदलोगे,
बस बदल जायेगा ये वक्त,
आज गुमां है तुमको
अपनी ऊर्जा पर,
कल झुकी कमर होगी
तो याद जरूर करना
इस समय को,
जो बहा कर ले चला है
अपने साथ समेटे
इन खारी और मीठी यादों को,
बस वो ही साथ रहेगा तब
तुम्हारी यादों में
और शायद मैं भी...!!!
#ज्योत्सना

Wednesday, 16 March 2016

प्रेम की परिभाषा...

रात भर तकलीफ में
अक्सर तुम ही,
क्यों याद आते हो...?
ये समझ न सका दिल,
बस सोचती हूँ तुम्हें
अपने आस-पास,
सिरहाने बैठे तुमको
सुनना अच्छा लगता है।
वो नसीहतें देना,
वो प्यार से झिड़की देना-
"ख्याल नहीं रखती हो अपना"
खुद पर ये अधिकार जताना,
बोलो यही तो परिभाषा है ना,
प्रेम की...?
#ज्योत्सना

Monday, 22 February 2016

वो बाबुल का अंगना

मौसम हुआ सुहाना,
याद आया फिर दिन पुराना,
वो बाबुल का अंगना,
वो चंदा का आना,
वो नहरों की कल-कल,
वो पेड़ों का लहराना।
वो कोयल का कूकना,
वो पत्तों का झरना,
रोज सवेरे आंगन बुहारना,
वो पेड़ वो पौधे जो रोपे थे कभी,
उनका यूं मस्ती में झूमना।
कभी रोना, कभी हंसना,
जीवन की लड़ाई को लड़ते जाना,
आज फिर याद आया,
वो बाबुल का अंगना।
#ज्योत्सना

Wednesday, 10 February 2016

भोर का स्वप्न

खफा हूँ आज खुद से ही,
वो समझ बैठे कि
गुनाह उनसे हुआ है,
स्नेह की बारिश कुछ यूं हुई
कि पिघल पड़ा मन,
अश्रुबूंदों ने धो दिए
सब शिकवे गिले।
खिल उठा रोम-रोम,
बसंत ऋतु में
जब दो दिल
आज कुछ यूं मिले।
स्वप्न था शायद भोर का,
सुना है
सच होते हैं न भोर के स्वप्न...?
#ज्योत्सना