Saturday, 21 April 2018

कुछ अनकहा रह गया...

दर्द के साये
जब कभी
चले आते हैं,
अन्तर्मन को
भीगा जाते हैं,
नम आँखों से
देखो तो
कितना कुछ
पीछे छूट गया,
कुछ कहा था,
कुछ अनकहा रह गया।
#ज्योत्सना

आख़िर एक स्त्री ही तो हूँ मैं...

रोज जूझती हूँ
कभी बाहर की
दुनिया से,
तो कभी
उस दुनिया से
जहाँ चलता
अन्तर्द्वंद्व है,
आखिर हूँ तो
एक स्त्री ही ना।

कितना ही कठोर
बन जाऊं,
पर पलता है
एक कोमल मन भी,
मिली प्रतिष्ठा जग में,
पर अक्सर अपने
दे जाते चोट
इस मन को,
आखिर एक स्त्री
ही तो हूँ मैं।
#ज्योत्सना

Sunday, 10 December 2017

एक स्त्री मन की पीड़ा...

चाह कर भी मन की बात लिख नहीं सकती। सोशल मीडिया पर भी जब बंदिशें लगाने लगे लोग तो कहाँ जायें जहाँ अपनी बात कह सकें।
अपने मन की बात अगर लिख भी डालूं तो अपनों के क्रोध की ज्वाला में जलना पड़ेगा।
उफ्फ़ क्यों इतना सशक्त होते हुए भी असहाय बना देता है ये पुरुष प्रधान समाज एक स्त्री को?😢
स्त्री का समर्पण, त्याग जो वो परिवार के लिए सालों से करती आई है, अचानक से सब भूलने लग जाते हैं जब वो अपनी छोटी-छोटी खुशियां तलाशने लगती है छोटी-छोटी बातों में।
क्या स्त्री को इतना भी अधिकार नहीं कि कुछ पल वो अपनी शर्तों पर जी सके?
क्या एक स्त्री मात्र मशीनी मानव की तरह सबकी इच्छायें पूरी करने के लिए है जिसे समाज ने नारी को त्याग, समर्पण का नाम देकर देवी बना दिया है। लेकिन क्या उसमें संवेदनायें नहीं हैं? क्यों संस्कारों के नाम पर उसके पैरों में बेड़ियां डाल दी गई हैं।
वो भी जीना चाहती है, खुले आकाश में।
कष्ट होता है बहुत जब सब कुछ सहते हुए भी मानसिक यातनायें कम होने का नाम नहीं लेती।
इतना असहाय कभी नहीं रही समाज के सामने जितना असहाय एक स्त्री अपनों के सामने हो जाती है।
नहीं बनना मुझे महान... बस एक छोटा सा मेरे हिस्से का आसमां दे दो मुझे...
थोड़ा सा जी लेने दो मुझे मेरी शर्तों पर...
नहीं चाहिए वो दिखावे की दुनियां जहाँ चेहरे पर नकाब के पीछे सिसकियां है...!!!

Thursday, 5 October 2017

हाँ, पसंद है मुझे, तुम्हें भी सहेज़ कर रखना...

हाँ, पसंद है मुझे
अतीत की यादों में रहना,
हर वो चीज़
जो जोड़ती है मुझे
मेरे अपनों से,
पसंद है मुझे
उन्हें सहेज़ कर रखना...

मिली है ये आदत मुझे,
विरासत में पिता से,
उन्हीं से सीखा
शब्दों को पिरोना भी,
पुराने बक्से में
वो पुरानी किताबें
सहेज़ कर रखना भी...

हर वो बात तुम्हारी भी
तीखी, मीठी,
रख दी है सहेज़ कर,
वैसी ही मिलेंगी,
जैसे कल की ही बात हो
हां,पसंद है मुझे
तुम्हें भी सहेज़ कर रखना...!!!
#ज्योत्सना

Wednesday, 28 June 2017

दरवाजा...

दरवाजे अक्सर
तभी बंद होते हैं,
जब किसी के आने की
उम्मीद खत्म हो जाती है।
कुछ दरवाजे फिर खुलते हैं,
सुबह की किरण के साथ,
लेकर नये एहसास...
लेकिन ऐसे भी होते हैं
कुछ दरवाजे
जो बंद हो जाते हैं सदा के लिए,
क्योंकि उन दरवाजों के पीछे
दफन हो जाती हैं वो उम्मीदें,
जो कभी पूरी नहीं होंगी...!!!
#ज्योत्सना

Tuesday, 20 June 2017

अनिकेत....

तुम्हें भूल जाती हूँ अक्सर,
ज़िंदगी की आपा-धापी में,
अचानक याद आ गई तुम्हारी,
जब वो लेख पढ़ा जो
तुम्हारे लिए लिखा था...
एक स्त्री को
ममत्व का एहसास
तुमने ही तो कराया था,
जब तुमने आँखें खोली थी,
मेरे आँचल में...
तुम्हारा वो मासूम स्पर्श,
रूई के सफेद फाहे की तरह,
तुम्हारा चेहरा...
सब कुछ आँखों के सामने है,
जैसे कल की ही बात हो...
बस तुम्हारा यूं
अचानक से चले जाना
जैसे सपना था मेरे लिए
पर हकीकत भी यही थी,
एक काला साया आया
सफेद कोट पहने
और छीन ले गया
कुछ ही घंटों में...
तुम्हें मुझसे सदा के लिए...
पीड़ा है बहुत मन में,
जो दिखती नहीं...
लेकिन
समय के साथ भरे घाव
अचानक यूं हरे हो जाते हैं...
तुम्हारे जाने का दिन जब
यूं सामने आ जाता है...!!!
#ज्योत्सना

Tuesday, 13 June 2017

तुम्हारा आग्रह माँ...

दुविधा में हूँ
कैसे स्वीकार करूँ
तुम्हारा आग्रह माँ...

बरसों बीत गये
तुमको देखे,
बहुत शिकायतें हैं तुमसे,
इतने बरसों की।

मेरा कसूर क्या था
जो तुम मुझको भूल गई,
एक नन्हीं जान को
अपनी खुशियों की खातिर
भूल गई।

तुम्हारे आँचल की छांव को
हमेशा तरसती रही हूँ,
बिन माँ की बच्ची
सुनते-सुनते बड़ी हुई हूँ।

अब जीना मैंने सीख लिया था,
बिन आँचल की छांव के,
जैसे कड़ी धूप में भी
रुक न सके जो पांव थे।

एक मौका दिया है वक्त ने
शायद फिर हमको भी,
तुम्हारा प्रेम जागृत हुआ है
इतने वर्षों बाद भी।

चाहती हूँ मैं भी
तुम्हारे आँचल में समा जाना,
वर्षों का जो खालीपन था,
चाहती हूँ उसे समेट लेना।

जानती हूँ तुम भी
जूझ रही हो ज़िंदगी से,
बस एक बार पुकार लो
तो चली आऊं मैं दौड़ के।

कैसे बताऊं सबको, 

ये कहानी तुम्हारी और मेरी ज़िंदगी की,

पर एक दिन वक्त सुना ही देगा,

दास्तां माँ -बेटी की...!!!

#ज्योत्सना