Tuesday, 21 January 2020
हाँ, एक पिता है वो...
Thursday, 9 January 2020
रोना ही है मुझको अब जी भर कर।
हर बार कहते हो मुझसे
पी जाती हूँ मैं अश़्कों को,
आँखों में उतर आती है
किसी बात पर जब नमी,
अचानक गायब हो जाती है,
बातों-बातों में,
यही कहना तुम्हारा हर बार होता है
कि पी जाती हूँ मैं अश़्कों को,
पर अब दूर हूँ तुमसे बहुत,
अब पी न पाऊँगी,
रोना ही है मुझको
अब जी भर कर...!
#ज्योत्सना
Monday, 4 March 2019
वो कुछ दिन गंगा किनारे...
अक्सर उस शहर पर पढ़ती है नज़र
तो याद आ जाती हैं पुरानी यादें
जब पहली बार ठीक से देखा
और जाना प्रकृति को,
बियाबान जंगल में यूं
तम्बू में रहना,
शहर की चकाचौंध से दूर,
गंगा की कलकल बहती धारा की
जब चांदनी रात में आवाज़ सुनाई देती
और चांदनी में नहाई चांदी सी रेत चमकती,
यूं अलाव जलाये आधी रात तक सबसे बतियाना,
जिंदगी जैैसे आज भी बुला रही हो वहाँ...!!
Sunday, 13 January 2019
माँ....
सब कुछ भुलाकर काश ज़िंदगी हो पाती कोरे पन्नों सी...
ऐसा नहीं कि सब खराब हो...
बहुत कुछ पाया भी है...
और वो सब मिला उसकी वजह से...
जो जिंदगी में था ही नहीं...
जब अभाव होता है जिंदगी में,
तभी ज़ुनून होता है कुछ पाने का...
लोगों की जो नज़रें देखती थी और जतलाती थी बेचारगी को,
सच कहूं वही प्रेरित करती थी कुछ कर गुजरने को....
अपना मुकाम पाने को जो....
हाँ, बिन माँ के बहुत कुछ सरल नहीं था ज़िंदगी में,
पिता का साया सदा साथ रहा,
पर कभी लगता है ना, माँ होती तो ऐसा होता,
वैसा होता, ज़िंदगी कुछ तो अलग होती ना...
हाँ, ये अभाव हमेशा रहा जीवन में...
आज भी है जब आभासी दुनियां में
देखती हूँ तुमको...
पर न जाने क्यों अज़नबी लगती हो मुझे तुम... माँ...
इस ज़िंदगी की कहानी का सूत्रधार तो तुम ही हो माँ....
Sunday, 6 January 2019
वो अजनबी... यादों के झरोख़ों से...
-"दीदी की ग्लूकोज़ बोतल चेंज करनी है।"
नर्स रुम में जाकर मैंने वहाँ अकेले बैठे एक इन्टर्न डॉक्टर से कहा।
-"ओके"
वो मेरे साथ चला आया क्योंकि वहाँ कोई नर्स नहीं थी उस वक्त।
-"वैसे ये मेरा काम नहीं है।"
नई ड्रीप बदलने में परेशानी हो रही थी उसको तो मुझे अपनी ओर देखकर वो बोला।
मैं मुस्करा दी तो वो भी मुस्कराने लगा।
उसके बाद वो झेंपता सा चला गया।
दो दिन बाद अपने सीनियर डॉक्टर के साथ वो फिर विजीट पर आया तो उस वक्त मैं टिफीन से खाना खा रही थी। कनखियों से देख कर हल्का मुस्करा दिया और मैंने भी सर नीचे कर लिया।
फिर दीदी नहीं रही और वो भी समय के साथ जिम्मेदारियों के बढ़ते स्मृतियों से विस्मृत होता चला गया।
ये उस वक्त की बात है जब मैं बी.एस.सी. प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी और दीदी अस्पताल में एडमिट थी।
अस्पताल के उन नौ-दस दिनों की यादों में ये क्षणिक पल भी कभी-कभी याद आ जाते हैं।
उसका नाम भी नहीं पता कर पाई और अब पता नहीं कहाँ होगा वो...!!!
#ज्योत्सना
Sunday, 25 November 2018
संवेदनाओं की मौत...
संवेदनायें जताई जाती हैं
मन में घुमड़ते भावों से,
और अक्सर व्यक्त होती हैं
आँसूओं की बहती धारा से...
अचानक सूख जाती है
ये अश्रुधारा,
जब संवेदनायें मरने लगती हैं,
मन पत्थर होने लगता है और भावहीन
जैसे बंजर भूमि पर कोई बीज
अंकुरित नहीं होता,
बिना खाद, पानी व मानवीय प्रयासों के,
उसी तरह मन भी बंजर होने लगता है,
प्रेमरुपी खाद, पानी के बगैर,
और सूखने लगती है प्रेम की पौध,
मन भावशून्य हो जाता है तब
और आँखें शुष्क,
हाँ, संवेदनाओं की मौत भी
कुछ ऐसी ही होती है...!!!
#ज्योत्सना
Saturday, 12 May 2018
मन...
बहुत कुछ घुमड़ता रहता है मन में,
कभी मायूस भी हो जाता है
तो कभी पल भर में
लौट आता है वहीं पर
सब कुछ भूलकर...
कभी लौट जाना चाहता है
मन अब घर की ओर,
कब तक रहेगा ये भटकाव
ज़िंदगी में,
एक स्थायित्व चाहता है
अब अपनों के साथ...
सोचते बहुत हैं हम
कुछ अलग कर जायेंगे,
ज़िंदगी को जीना सीखा जायेंगे,
पर इस बीच खुद की ज़िंदगी
पीस जाती है,
चक्की के दो पाटों के बीच,
अनायास मन कुलबुलाने लगता है,
घर छोटा सा अपना
वापस बुलाने लगता है...
दूसरों के लिए जीते-जीते
कब हम अपने लिए जीना भूल जाते हैं,
याद नहीं रहता,
वक्त न जाने कितना कुछ
समेट ले गया,
ज़िंदगी को अब
गले लगाना चाहता है मन,
थक गया है बहुत
बस अब जीना चाहता है मन...!!!
#ज्योत्सना