Sunday, 6 January 2019

वो अजनबी... यादों के झरोख़ों से...

-"दीदी की ग्लूकोज़ बोतल चेंज करनी है।"
नर्स रुम में जाकर मैंने वहाँ अकेले बैठे एक इन्टर्न डॉक्टर से कहा।
-"ओके"
वो मेरे साथ चला आया क्योंकि वहाँ कोई नर्स नहीं थी उस वक्त।
-"वैसे ये मेरा काम नहीं है।"
नई ड्रीप बदलने में परेशानी हो रही थी उसको तो मुझे अपनी ओर देखकर वो बोला।
मैं मुस्करा दी तो वो भी मुस्कराने लगा।
उसके बाद वो झेंपता सा चला गया।
दो दिन बाद अपने सीनियर डॉक्टर के साथ वो फिर विजीट पर आया तो उस वक्त मैं टिफीन से खाना खा रही थी। कनखियों से देख कर हल्का मुस्करा दिया और मैंने भी सर नीचे कर लिया।
फिर दीदी नहीं रही और वो भी समय के साथ जिम्मेदारियों के बढ़ते स्मृतियों से विस्मृत होता चला गया।
ये उस वक्त की बात है जब मैं बी.एस.सी. प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी और दीदी अस्पताल में एडमिट थी।
अस्पताल के उन नौ-दस दिनों की यादों में ये क्षणिक पल भी कभी-कभी याद आ जाते हैं।
उसका नाम भी नहीं पता कर पाई और अब पता नहीं कहाँ होगा वो...!!!
#ज्योत्सना

Sunday, 25 November 2018

संवेदनाओं की मौत...

संवेदनायें जताई जाती हैं
मन में घुमड़ते भावों से,
और अक्सर व्यक्त होती हैं
आँसूओं की बहती धारा से...
अचानक सूख जाती है
ये अश्रुधारा,
जब संवेदनायें मरने लगती हैं,
मन पत्थर होने लगता है और भावहीन
जैसे बंजर भूमि पर कोई बीज
अंकुरित नहीं होता,
बिना खाद, पानी व मानवीय प्रयासों के,
उसी तरह मन भी बंजर होने लगता है,
प्रेमरुपी खाद, पानी के बगैर,
और सूखने लगती है प्रेम की पौध,
मन भावशून्य हो जाता है तब
और आँखें शुष्क,
हाँ, संवेदनाओं की मौत भी
कुछ ऐसी ही होती है...!!!
#ज्योत्सना

Saturday, 12 May 2018

मन...

बहुत कुछ घुमड़ता रहता है मन में,
कभी मायूस भी हो जाता है
तो कभी पल भर में
लौट आता है वहीं पर
सब कुछ भूलकर...

कभी लौट जाना चाहता है
मन अब घर की ओर,
कब तक रहेगा ये भटकाव
ज़िंदगी में,
एक स्थायित्व चाहता है
अब अपनों के साथ...

सोचते बहुत हैं हम
कुछ अलग कर जायेंगे,
ज़िंदगी को जीना सीखा जायेंगे,
पर इस बीच खुद की ज़िंदगी
पीस जाती है,
चक्की के दो पाटों के बीच,
अनायास मन कुलबुलाने लगता है,
घर छोटा सा अपना
वापस बुलाने लगता है...

दूसरों के लिए जीते-जीते
कब हम अपने लिए जीना भूल जाते हैं,
याद नहीं रहता,
वक्त न जाने कितना कुछ
समेट ले गया,
ज़िंदगी को अब
गले लगाना चाहता है मन,
थक गया है बहुत
बस अब जीना चाहता है मन...!!!
#ज्योत्सना

Saturday, 21 April 2018

कुछ अनकहा रह गया...

दर्द के साये
जब कभी
चले आते हैं,
अन्तर्मन को
भीगा जाते हैं,
नम आँखों से
देखो तो
कितना कुछ
पीछे छूट गया,
कुछ कहा था,
कुछ अनकहा रह गया।
#ज्योत्सना

आख़िर एक स्त्री ही तो हूँ मैं...

रोज जूझती हूँ
कभी बाहर की
दुनिया से,
तो कभी
उस दुनिया से
जहाँ चलता
अन्तर्द्वंद्व है,
आखिर हूँ तो
एक स्त्री ही ना।

कितना ही कठोर
बन जाऊं,
पर पलता है
एक कोमल मन भी,
मिली प्रतिष्ठा जग में,
पर अक्सर अपने
दे जाते चोट
इस मन को,
आखिर एक स्त्री
ही तो हूँ मैं।
#ज्योत्सना

Sunday, 10 December 2017

एक स्त्री मन की पीड़ा...

चाह कर भी मन की बात लिख नहीं सकती। सोशल मीडिया पर भी जब बंदिशें लगाने लगे लोग तो कहाँ जायें जहाँ अपनी बात कह सकें।
अपने मन की बात अगर लिख भी डालूं तो अपनों के क्रोध की ज्वाला में जलना पड़ेगा।
उफ्फ़ क्यों इतना सशक्त होते हुए भी असहाय बना देता है ये पुरुष प्रधान समाज एक स्त्री को?😢
स्त्री का समर्पण, त्याग जो वो परिवार के लिए सालों से करती आई है, अचानक से सब भूलने लग जाते हैं जब वो अपनी छोटी-छोटी खुशियां तलाशने लगती है छोटी-छोटी बातों में।
क्या स्त्री को इतना भी अधिकार नहीं कि कुछ पल वो अपनी शर्तों पर जी सके?
क्या एक स्त्री मात्र मशीनी मानव की तरह सबकी इच्छायें पूरी करने के लिए है जिसे समाज ने नारी को त्याग, समर्पण का नाम देकर देवी बना दिया है। लेकिन क्या उसमें संवेदनायें नहीं हैं? क्यों संस्कारों के नाम पर उसके पैरों में बेड़ियां डाल दी गई हैं।
वो भी जीना चाहती है, खुले आकाश में।
कष्ट होता है बहुत जब सब कुछ सहते हुए भी मानसिक यातनायें कम होने का नाम नहीं लेती।
इतना असहाय कभी नहीं रही समाज के सामने जितना असहाय एक स्त्री अपनों के सामने हो जाती है।
नहीं बनना मुझे महान... बस एक छोटा सा मेरे हिस्से का आसमां दे दो मुझे...
थोड़ा सा जी लेने दो मुझे मेरी शर्तों पर...
नहीं चाहिए वो दिखावे की दुनियां जहाँ चेहरे पर नकाब के पीछे सिसकियां है...!!!

Thursday, 5 October 2017

हाँ, पसंद है मुझे, तुम्हें भी सहेज़ कर रखना...

हाँ, पसंद है मुझे
अतीत की यादों में रहना,
हर वो चीज़
जो जोड़ती है मुझे
मेरे अपनों से,
पसंद है मुझे
उन्हें सहेज़ कर रखना...

मिली है ये आदत मुझे,
विरासत में पिता से,
उन्हीं से सीखा
शब्दों को पिरोना भी,
पुराने बक्से में
वो पुरानी किताबें
सहेज़ कर रखना भी...

हर वो बात तुम्हारी भी
तीखी, मीठी,
रख दी है सहेज़ कर,
वैसी ही मिलेंगी,
जैसे कल की ही बात हो
हां,पसंद है मुझे
तुम्हें भी सहेज़ कर रखना...!!!
#ज्योत्सना